सोशल मीडिया के अधिक उपयोग से युवाओं में बाढ़ रही है
तनाव, नकारात्मकता की समस्या



          फेसबुक, स्नैपचैट, रेडिट, इंस्टाग्राम आदि सोशल साइट्स का अधिक उपयोग करने से ये हमारे दिमाग पर हावी हो जाता है, हम इस इंतेजार में रहते की हमारे पोस्ट पर ज्यादा से ज्यादा लाइक्स आए, ये हमारे मस्तिष्क को हाईजैक कर देता है। हमारे द्वारा किये गए पोस्ट पर अगर कम  लाइक्स  आते है तो हम  परेशान हो जाते है, तथा हमारा दिमाग पोस्ट को लेकर अलग - अलग सवाल बना देता है जिससे हम डिप्रेशन का शिकार हो जाते है, सोशल मीडिया को लेकर टेक एक्सपर्ट लगातार फिक्रमंद रहते है। 2016 में हुए एक शोध में ये परिणाम भी आया था, कि सोशल मीडिया पर ज्यादा समय व्यतीत करने का सीधा संबंध डिप्रेशन से है। हाल ही में  दैनिक भास्कर में प्रकाशित आलेख जिसमें फेसबुक को लाइक बटन देने वाले जस्टिन रिसेंसटीन ने भी इस बात को माना है कि सोशल मीडिया  का अधिक उपयोग हमे इसका आदी बना सकता है यह एक नशे की भांति कार्य करता है। उनका मानना है कि सोशल मीडिया एक वर्चुअल वर्ल्ड (आभासी दुनिया) है। इसकी वजह से सबसे पहले तो हम डिस्टोपिया  (काम से ध्यान भटकना) के शिकार हो रहे है। साथ ही ये असली दुनिया से भी हमे दूर कर देता है। किसी पोस्ट पर ज्यादा लाइक्स आते है, तो वही हमारे लिये खुशी होती है। ये सूडो-हैप्पीनेस (नकली खुशी) है। हम अटेंशन इकोनॉमी के शिकार है। यहाँ हमें सिर्फ दूसरो का ध्यान आकर्षित करना है। लाइक्स पाने है। ये नही होता तो हमारे लिए डिप्रेशन तक का खतरा पैदा हो जाता है। 

युवा वर्ग की जीवनशैली में असर -
                सूचना क्रांति के इस युग मे आज सोशल मीडिया फेसबुक, ट्विटर, स्नैपचैट, रेडिट, इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफार्म युवाओं के लिये दोधारी तलवार साबित हो रही है, या तो ज्यादातर युवा इन पर अपनी समझ से नही चलते बल्कि सामने वाले का अनुसार अनुसरण करते है। उन्हें इसकी लत लग जाती हैं। 
सोशल मीडिया के प्रति युवाओ की दीवानगी जहाँ कई मायनो में सार्थक नजर आती है, वहीं इसके दुरुपयोग के मामले भी सामने आते रहते है। सोशल मीडिया के अधिक उपयोग से युवाओ में आलस्य, डिप्रेशन, तनाव, नकारात्मकता आदि को देखा गया है। 
सोशल मीडिया का अधिक उपयोग करने वाले युवा अपने जीवन का नियंत्रण अन्य लोगो के हाथों में दे देते है। सोशल मीडिया पर अधिक सक्रियता से युवा प्रभावित हो रहा है, युवाओ को इसे बेलैंस करना बहुत जरूरी है। अन्यथा उनमें डिप्रेशन और स्ट्रैस लैवल भी बढ़ेगा , यह बहुत ज्यादा सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने का असर है। यदि कोई दो घंटे से ज्यादा सोशल मीडिया पर सक्रिय रहता है, तो इसका असर उसके स्वास्थ्य पर पड़ेगा। जिसके कारण युवाओं में सम्बन्ध बदलाव देखे गए है। जिनके कारण उनकी शिक्षा और व्यक्तिगत संबंधों पर बहुत असर पड़ता है। 

मानसिक स्वास्थ्य पर असर
                सोशल मीडिया ने हमें जितना ज्यादा लोगों से जोड़ने का काम किया है, उससे कई ज्यादा इसने हमारे मन मस्तिष्क पर अपनी गहरी छाप छोड़ी है। हम आज तकनीक के मामले में बहुत ज्यादा आधुनिक हो चुके हैं, लेकिन हम यह भूलते जा रहे हैं कि इसके विपरीत परिणामों ने हमारे अंदर घर कर लिया है। सोशल मीडिया ने ना केवल हमारे भीतर मानसिक कमजोरी को पैदा किया, बल्कि इन कमोजरियों के साथ-साथ मानसिक रोगों को भी जन्म दिया है। इसके कारण हमारे भीतर की रचनाशीलता कमजोर होती जा रही है। हम सभी लोगों के पास होते हुए भी उनसे बहुत ज्यादा दूर हो चुके हैं। ज्यादा से ज्यादा समय सोशल मीडिया पर बिताने के कारण हमें इसकी आदत हो गयी है और इनका हमारे मष्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ा है। क्योंकि जिस तरह से हम आज सोशल मीडिया पर लगातार अपना समय बिता रहे हैं, इसका सीधा प्रभाव हमारे मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। आइए जानते हैं सोशल मीडिया और मानसिक स्वास्थ्य के बीच क्या सम्बंध है। 

सोचने समझने की शक्ति पर गहरा -
               सोशल मीडिया आज हमारे लिए एक सुविधा के साथ-साथ एक बड़ी समस्या भी बनता जा रहा है। खासकर युवाओं के लिए। जिन युवाओं को एक समय पर उनकी नई सोच के लिए जाना जाता था, आज सोशल मीडिया ने उनसे उनकी उस सोच को छीन लिया है। आज लोग सोशल मीडिया का इतना ज्यादा प्रयोग कर रहे हैं कि उनकी खुद की सोचने और समझने की शक्ति कम होने लगी है। ऐसा इसलिए क्योंकि हम जो कुछ भी सोशल मीडिया पर देखते हैं उसे ही सत्य मान लेते हैं और उसी पर विश्वास करने लगते हैं। जिसके कारण दिमाग में सोचने समझने की क्षमता पर फर्क पड़ने लगता है।

सोशल डिसऑर्डर -
               सोशल मीडिया एक तरह का वर्चुअल समाज है, जहां हमारे जैसे लाखो लोग होते हैं जिनसे हम रोजाना ऑनलाइन मिलते हैं और उनसे अपनी बातों को साझा करते हैं। इसके कारण हमने बहुत से दोस्त तो बना लिए है लेकिन जो असल में हमारे करीबी हैं, उनसे हम पूरी तरह से अलग हो जाते है। क्योंकि सोशल मीडिया हमारे मन मस्तिष्क पर इस कदर हावी हो जाता है कि हम उससे बाहर निकलना नहीं चाहते हैं और ज्यादा से ज्यादा वही पर अपना समय बिताना चाहते हैं। ऐसे में बाहरी दुनिया से पूरी तरह से कट जाते हैं। बाहर की दुनिया से दूर होते चले जाना ही सोशल डिसऑर्डर के होने की ओर संकेत करता है।

एडिक्टिव डिसऑर्डर को जन्म देता है -
                  किसी भी चीज को सामान्य से ज्यादा प्रयोग करना लत कहलाता है। इस तरह की प्रवृति आने के पीछे मानसिक विकारों को भी कारण ठहराया जाता है। आज सोशल मीडिया से भी लोगों में इस तरह की प्रवृति जागृत हो रही है। इसके कारण लोग बाकी सभी कामों को छोड़ कर सिर्फ और सिर्फ सोशल मीडिया में अपना वक्त जाया कर रहे हैं जो कि ठीक नहीं है। इसका सबसे ज्यादा असर हमारे मस्तिष्क पर पड़ता है। हमारे भीतर की रचनात्मकता खत्म होती जा रही है। इस समस्या से कई अन्य तरह के मानसिक विकार उत्पन्न हो रहे हैं, जो हमारी सेहत के लिए बहुत ज्यादा खतरनाक हैं।
-अभिषेक खरे