जीवनदायिनी प्रकृति


       ऑक्सिजन अर्थात प्राणवायु का मूल्य हमें इस कोरोना महामारी में भली-भांति समझ में आया होगा। हमने प्रकृति का बहुत दोहन किया, जंगलों को काट कर हमने बड़े शहर बसा दिए, बड़े बड़े उद्योग लगा दिए, अपनी सुख-सुविधाओं के लिए हमने प्रकृति का अंधाधुन दोहन किया। प्रक्रति का दोहन करते-करते हम यह भूल गए कि जो हमें जीने के लिए प्राणवायु चाहिए होती है, वह इन्हीं पेड़, पौधों, वृक्षों की बदौलत
है। 

आयुर्वेद में प्रकृति का उपयोग

        आयुर्वेद की  दवाइयां वनस्पति, पेड़, जड़ीबूटी एवं लताओं से बनती है। पेड़ हमें प्राणवायु देते हैं लेकिन इसके बाद भी हम जंगलों को नष्ट करते आ रहे हैं हमें यह सोचना होगा कि हमारी आने वाली पीढ़ी सांस कैसे लगी। वर्तमान समय में हम इन्हीं पेड़-पौधे की जडी- बूटी जैसे गिलोय, तुलसी, हल्दी, लौंग, कालीमिर्च आदि का प्रयोग कर आयुर्वेद काढ़ा बनाकर उपयोग कर रहे हैं। कोरोना महामारी के इस समय में आयुर्वेद काढ़े का उपयोग करने से लाभ प्राप्त हो रहा हैं।

भारतीय संस्कृति में वृक्षों का महत्व

        भारतीय संस्कृति में वृक्षों का विशेष महत्त्व है, क्योंकि वे हमारे जीवन के प्राण हैं। पुराणों तथा धर्म-ग्रंथों में पेड़-पौधों को पवित्र और देवता के रूप में माना जाता है, इसलिए उनके साथ पारिवारिक संबंध बनाए जाते हैं। जब से वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि पेड़-पौधों में भी जीवन होता है, लोक विश्वासों में दृढ़ता आई है, इसलिए पाप और पुण्य की अवधारणा भी उसके साथ जुड़ गई है और देव तुल्य वृक्षों का संरक्षण पुण्य व उनका विनाश करना पाप स्वरूप माना जाने लगा है।

        'वट सावित्री' के अवसर पर स्त्रियां अचल सौभाग्य देने वाले बरगद के वृक्ष की पूजा करती हैं। गुरुवार के दिन केले के वृक्ष की पूजा की जाती है। इसके पत्ते पर भोजन करना शुभ माना जाता है। पारिजात वृक्ष को कल्पवृक्ष मानकर पूजा जाता है। अशोकाष्टमी के दिन अशोक वृक्ष की पूजा दुख को मिटाकर आशा को पूर्ण करने के लिए की जाती है। आंवले के वृक्ष में भगवान् विष्णु का निवास मानकर कार्तिक मास में इसकी पूजा, परिक्रमा करके स्त्रियां सुहाग का वरदान मांगती हैं। आम के पत्ते, मंजरी, छाल और लकड़ी यज्ञ व अनुष्ठानों में उपयोग की जाती हैं। पीपल के वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास माना जाता है। इस पर जल चढ़ाने, पूजा करने से संतान सुख मिलता है। इसके तने पर सूत लपेटना और परिक्रमा लगाने का भी विधान शास्त्रों में बताया गया है। तुलसी की नित्य पूजा करके जल चढ़ाना और इसके पास दीपक जलाकर रखना भारतीय नारियों का एक धार्मिक कृत्य है। विष्णु भगवान की प्रिया मानकर इसका पूजन किया जाता है। तुलसीदल का काफी महत्त्व माना जाता है l

        पीपल  100%, बरगद 80% एवं नीम 75%  कार्बन डाइऑक्साइड   को अवशोषित करता है और प्राणवायु प्रदान करता है। वर्तमान समय में मनुष्य ने इन वृक्षों से दूरी बना ली है और इन वृक्षों की जगह विदेशी यूकेलिप्टस, गुलमोहर और अन्य सजावटी पेड़ो को लगाने की प्रथा हमने प्रारम्भ कर दी है। इन वृक्षों के अत्यधिक रोपण से भूमि का जल स्तर लगातार घट रहा है, वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने वाले वृक्षों की संख्या कम होने से धरती का तापमान बढ़ने लगा है और जल भाप बनकर उड़ रहा है। 

        वर्तमान समय को देखते हुए और वायुमंडल में प्रदूषण के स्तर को सुधारने के लिये हम 500 मीटर की दूरी पर एक पीपल का पेड़ लगाए तो आने वाले वर्षों में प्रदूषण के स्तर को कम किया जा सकता है।

        प्रकृति हमारी मां के समान है और मां अपने बच्चों को हर वह सुख सुविधाएं उपलब्ध कराती है जो उसके जीवन यापन के लिए जरूरी है। हमारा भी दायित्व है कि हम इसको कुछ दे। संकल्प ले कि मैं मेरे जन्म दिवस पर या किसी शुभ कार्य पर एक वृक्ष का रोपण करूँगा तथा उसके बड़े होने तक सेवा करूँगा।

-अभिषेक खरे

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