त्रिदेव ब्रह्मा विष्णु महेश में से एक है। वह त्रिदेवों में एक देव हैं। इन्हें देवों के देव महादेव भी कहते है। इन्हें भोलेनाथ, शंकर, महेश, रूद्र, नीलकंठ, गंगाधर, बाघम्बर आदि नामों से जानाह्म जाता है। तंत्र साधना में इन्हें भैरव के नाम से भी जाना जाता है। भगवान शिव से भारतवर्ष के मनुष्यों की आस्था एवं पूजन करके सभी धन्य हो जाते है आदिदेव महादेव के दर्शन मात्र से सारे चिंतन, समस्याएं, दुःख, दर्द समाप्त हो जाते है। माता कुंती भगवान शिव की उपासक थी वह अन्न, जल शिव की पूजना एवं अर्चना के उपरांत की ग्रहण करती थी। इसकी को देखते हुए पांडवों ने एक रात में एक ही चट्टान से एक विशालकाय शिवलिंग का निर्माण किया। आईए जानते है इस बारे में ...................


        भोजपुर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल (Bhopal) से 30 किमी दूर, विदिशा से 45 किमी दूर, एवं रायसेन जिले में बेतवा नदी के किनारे बसा भोजपुर (Bhojpur) की पहाड़ियों पर एक प्राचीन काल का यह मंदिर एक विशाल शिव मंदिर (Shiv Temple) है। कई इतिहासकार का कहना है कि यह मंदिर 6.5 हजार साल पुराना है, कहते है कि महाभारत के समय पांडवों को मिले अज्ञातवास के दौरान पांडव यहां आकर रूके थे। पांडवों की माता कुंती भगवान शिव की उपासक थीं। कुंती शिव पूजा के बाद ही अन्न, जल ग्रहण करती थी, इसकी का देखते हुए पांडवों ने एक ही चट्टान सबसे बड़े शिवलिंग का निर्माण एक ही रात में किया, लेकिन छत बनाने से पहले ही सुबह हो गई। इसलिए छत सहित कुछ अन्य कार्य अब तक अधूरे है।

राजा भोज ने कराया था जीर्णोद्वार

      
 भोजपुर के शिव मंदिर को उत्तर भारत का सोमनाथ भी कहा जाता है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि एक बार राजा भोज किसी बिमारी से ग्रसित हो गए थे। तब किसी प्रसिद्ध वैद्य ने उन्हें 9 नदी और 99 नाले जिस नदी में मिलते है, उस नदी में स्नान करने और शिव की आराधना करने के लिए कहां था, तब राजा भोज ने यहां आकर स्नान किया और शिव की आराधना की, इसके बाद उनकी बीमारी ठीक हो गई थी। इससे प्रसन्न होकर राजा भोज ने शिवलिंग की स्थापना एवं मंदिर का जीर्णोद्वार (1010 ई. - 1055 ई.) के बीच में कराया। 

एक वर्ष में दो बार मेले का होता है आयोजन

इस प्रसिद्ध स्थल पर साल में दो बार मेले का आयोजन किया जाता है। जो कि मंकर संक्रांति व महाशिवरात्रि पर्व होता है। इस मेले में भारत के कोने-कोने से  श्रद्धालु इस विशालकाय शिवलिंग के दर्शन के लिए आते है। शिवरात्रि के समय मेले में लाखों की संख्या में लोग दर्शन के लिए आते है। यह शिवलिंग की 21.5 फीट ऊंचा, 14 फीट जमीन में, 7.5 फीट जलधारी के ऊपर, 18.8 इंच का व्यास एवं 400 वर्गफीट में इसकी जलधारी है।